आपस में मिल जाती है
फिर संग चलते चलते
दो राहें क्यों हो जाती हैं
कितने मुसाफ़िर कितनी मंज़िलें
इन राहों ने साथ ही देखीं हैं
अमिट फ़सानो की बेफ़िक्रियाँ
इन राहों ने ही झेली हैं
थके हुए आसमान भी जब
दूर तलक झुक जाते
जाने कैसे नभ के तारे
इन राहों से टकराते है
रात भी देखी साथ में तेरे
दिन का उजाला ओढ़ा है
बरखा की चंद बूँदों से
गीला रास्ता महका है
फिर आता है मोड़ कभी
ये मोड़ बड़े आड़े टेड़े
फिर कुछ तो हो जाता है
सब राहें ख़ुद खो जातीं हैं
फिर ऐसा क्या हो जाता है
मंज़िले क्यों बँट जाती है
क्यों संग चलते चलते यूँही
दो रहे क्यों हो जाती हैं
2 comments:
बहुत अच्छे दीप !!
बहुत अच्छे दीप !!
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