Friday, May 13, 2016

दो राहें

ना जाने क्यों दो राहें 
आपस में मिल जाती है 
फिर संग चलते चलते 
दो राहें क्यों हो जाती हैं 

कितने मुसाफ़िर कितनी मंज़िलें 
इन राहों ने साथ ही देखीं हैं 
अमिट फ़सानो की बेफ़िक्रियाँ 
इन राहों ने ही झेली हैं

थके हुए आसमान भी जब 
दूर तलक झुक जाते 
जाने कैसे नभ के तारे 
इन राहों से टकराते है 

रात भी देखी साथ में तेरे 
दिन का उजाला ओढ़ा है 
बरखा की चंद बूँदों से 
गीला रास्ता महका है

फिर आता है मोड़ कभी
ये मोड़ बड़े आड़े टेड़े
फिर कुछ तो हो जाता है 
सब राहें ख़ुद खो जातीं हैं 

फिर ऐसा क्या हो जाता है 
मंज़िले क्यों बँट जाती है 
क्यों संग चलते चलते यूँही
दो रहे क्यों हो जाती हैं 








2 comments:

anuprathour said...

बहुत अच्छे दीप !!

anuprathour said...

बहुत अच्छे दीप !!