रेत की स्याही से लिखे
लम्बी गहरी यादों के
ये पल चिन्ह
आगे बड़ते बढ़ते
चमकीली रेत पे
कुछ गहरे कुछ उथले
ये पग चिन्ह
लहर अभी तक दूर थी
दिन बस ढलने लगा
संध्या तम से तीव्रता थी
अनभिज्ञ मन के झरोखों में
एक एक ज्वार भारी पड़ा
उथले गहरे प्रतिबिम्बों पे
सब चिन्हों का नाश हुआ
सब आलिंगन झूठे थे
पैरों की गलियों में कहीं
रेणु के कुछ पल अटक गए
ना जाने क्यों इनको संजोये रखें हैं
कुछ पल चिन्हों के पग चिन्ह
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