Sunday, June 26, 2016

रेवा

प्रस्तावना: ये कविता लोककथाओं से प्रेरित नर्मदा की है । कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रही या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन हर कथा का अंत कमोबेश वही, कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उलटी दिशा में चल पड़ीं। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती दिखाई देती है। मत्स्यपुराण में नर्मदा का वर्णन इस प्रकार है जिसे मैंने भी अपनी कविता में हिंदी में रूपांतरित किया है - 
"पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती । ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥ "
उद्गम विंद्याचल की गोद में
नाम मेरा नर्मदा,
इठलाती बलखाती मैं
मेघदूत की रेवा ॥

जैसे सारी नदियाँ झूमें
मैं भी वैसे झूमी ,
निकल पड़ी पूरब की ओर
निष्छल चंचल हिरणी ॥

संगमरमर का यौवन लेकर
शोणभद्र को पाया ,
जुहिला नामक सखी को
ये प्रेम प्रसंग सुनाया ॥

ईर्षा ने जुहिला के मन में
तीर घृणा के बांधे ,
मेरे आभूषण वस्त्र पहनकर
पहुँची सोन के आगे ॥

निष्ठुर पुरुष, दुर्बल नियत
नियति ने पाश बिछाया,
जुहिला सोन एक हुए
अश्रु मन भांप न पाया

क्रोधग्नि से कम्पित मैं
विपरीत दिशा में भागी,
अश्रु सिंचित मार्ग की सारी
चट्टानों पर भारी ॥

सोन पछताया ,और चीखा लौट आ 
वियोगमय ये जीवन ,है श्राप सा ,
आप से रंजीत हूँ ,नतमस्तक खड़ा 
क्यों न अपनी धाराओं को ,मैं बाँध सका ॥ 

अश्रु नैनों  में  ओझल , नर्मदे  । 
वेगधारी क्रांतिकारी , नर्मदे  । 
शक्ति की पर्याय तू है , नर्मदे  । 
स्वछता चरमोशिखर  है , नर्मदे  । 

गंगा कनखल  में  पवित्र है 
सरस्वती  कुरुक्षेत्र 
तू कण  कण  मैं पवित्र है 
नमन  तीर्थक्षेत्र  ॥ 

रूद्र कन्या हूँ मैं सोन,
अपमान न सह पाऊँगी,
नियति मेरी पश्चिम है
खम्बाट में मिल जाऊँगी ॥

दूर सोन से जाऊँगी
जितनी है रात अरुण से,
प्रेम मधुरता दूर रहे,
हूँ रुष्ट सारे जगत से ॥

रंज से उत्तम न कोई जोश है,
क्रोध की ज्वाला में ही तो रोष है,
हो कठोर जितना भी पर्वत सामने,
चिर सफलता ही तो मेरा दोष है ॥

वेगधारा होगा मेरा हर घाट,
शूलपाणि हो या भेड़ाघाट,
शुकलतीर्थ कपिलधारा,
तांडव है मेरा नाद ॥

शांत तब जब मुक्ति मिले
जीवन है तीव्र बहना,
हर उस कण में शक्ति भरदूं
जहाँ अंधियारी रैना ॥

दीप वेद - जून ६, २०१६


Thursday, May 26, 2016

पग चिन्ह

कुछ पग चिन्ह
रेत की स्याही से लिखे 
लम्बी गहरी यादों के
ये पल चिन्ह

आगे बड़ते बढ़ते 
चमकीली रेत पे 
कुछ गहरे कुछ उथले
ये पग चिन्ह

लहर अभी तक दूर थी 
दिन बस ढलने लगा 
संध्या तम से तीव्रता थी
अनभिज्ञ मन के झरोखों में

एक एक ज्वार भारी पड़ा
उथले गहरे प्रतिबिम्बों पे
सब चिन्हों का नाश हुआ
सब आलिंगन झूठे थे 

पैरों की गलियों में कहीं 
रेणु के कुछ पल अटक गए 
ना जाने क्यों इनको संजोये रखें हैं 
कुछ पल चिन्हों के पग चिन्ह


Friday, May 13, 2016

दो राहें

ना जाने क्यों दो राहें 
आपस में मिल जाती है 
फिर संग चलते चलते 
दो राहें क्यों हो जाती हैं 

कितने मुसाफ़िर कितनी मंज़िलें 
इन राहों ने साथ ही देखीं हैं 
अमिट फ़सानो की बेफ़िक्रियाँ 
इन राहों ने ही झेली हैं

थके हुए आसमान भी जब 
दूर तलक झुक जाते 
जाने कैसे नभ के तारे 
इन राहों से टकराते है 

रात भी देखी साथ में तेरे 
दिन का उजाला ओढ़ा है 
बरखा की चंद बूँदों से 
गीला रास्ता महका है

फिर आता है मोड़ कभी
ये मोड़ बड़े आड़े टेड़े
फिर कुछ तो हो जाता है 
सब राहें ख़ुद खो जातीं हैं 

फिर ऐसा क्या हो जाता है 
मंज़िले क्यों बँट जाती है 
क्यों संग चलते चलते यूँही
दो रहे क्यों हो जाती हैं 








Monday, April 11, 2016

प्यारी नैयना



गोला छोटा सा गोला
हवा से हल्का, बादल का टुकड़ा
छोटा सा गोला रुईका गोला 

मुस्कुराते नैयना तेरे 
गोल गोल कान 
प्यारी छोटी बिल्ली मेरी
तू हम सबकी जान 

तू हम सबकी जान कहूँ क्यों 
नन्हें पग जब रखती
टूकुर टूकुर हम सब तुम्हें देखें
धप्प से जब तू गिरती

धप्प से जब तू गिरती फिर
हम सबका जी घबराए
फिर मुस्कान से पलक झपकती
हम सब फिर इठलाएँ

गोद उठाकर पुच्ची पुच्ची
प्यार से तुम्हें झुलाएँ
मामा मामी जन्मदिवस पे
सारी ख़ुशियाँ लुटाएँ

दीप वेद 





Sunday, April 10, 2016

खो गया

भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया

सुगबग़ाहट मन ही मन में हो रही
आँखें मूँदें तम निशा में खो गया
चाँद से कहना तू मद में चूर है
मैं निशा की ओस ही में बह गया

साथ मेरे भीड़ यूँ ही मौन है
मैं तो पंछी कब का देखो उड़ गया
है ख़यालों में वही बस नाम यूँ 
आँख मूँदीं तो सवेरा हो गया

भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया

दीप वेद

Friday, March 25, 2016

रंग आज का

परछायियों के रंग नहीं 
और रंगों में कहाँ हैं परछायियाँ
फिर क्यों ढूँढ़े रंगों को परछायियों में

जो आज है वो रंग है
जो बीत गया सो कल
जब आने वाला ज्ञात नहीं
तो जी लो यह एक पल

दीप