किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया
सुगबग़ाहट मन ही मन में हो रही
आँखें मूँदें तम निशा में खो गया
चाँद से कहना तू मद में चूर है
मैं निशा की ओस ही में बह गया
साथ मेरे भीड़ यूँ ही मौन है
मैं तो पंछी कब का देखो उड़ गया
है ख़यालों में वही बस नाम यूँ
आँख मूँदीं तो सवेरा हो गया
भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया
दीप वेद
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