Friday, November 28, 2014

शीत संध्या

शीत संध्या

ये लावा सी शाम,
घाना आसमान,
खिड़की की ओट से,
सुलघ सुलघ जाए ।

निशा का आवन,
ठिठुरते प्राण,
भागती किरणों को,
पकड़ के लाये । 

ये डूबता अभिमान,
शीतलहर शाम,
कनक बादलों पर,
रंग बिखेरे जाए । 

कुछ बैगनी से धब्बे,
कुछ गुलाबी जुरमुठें ,
नारंगी फ़िज़ा में ,
घुले घुले जाए ।
 

Friday, September 26, 2014

छुक छुक गाड़ी

छुक छुक गाड़ी 

ये पंक्तियाँ आज से करीब ५ साल पहले लिखी गयी जब मैं अपने घर से वापस अमेरिका आ रहा था। पंजाब मेल थर्ड ए सी साइड लोअर बिर्थ, पूर्णिमा की रात, भीड़ का मेला या मेले की भीड़ समझना मुश्किल था । नानाप्रकार  की संवेदनाओं से भरा ये सफर कुछ यूँ  बयां हो रहा था:

गतिमान हृदय और जटिल बुद्धि समय के बंधनों का विश्लेषण करते हुआ सोच रही थी कि

इस पल दो पल की कहानी मे,
जब आस जगी हल्की हल्की,
फिर बात वही सूनी सूनी,
बस रात बढ़ी चलते चलते । 

पल पल की, ये मैं बात कहूँ ,
ठंडी ठंडी सी रात वही,
कुछ तारे मुट्ठी में  सिकोड़ें,
स्वेत बिंदु को चाँद कहूँ । 

भीनी भीनी सी निशा मग्न,
ये रेल चले हलके हलके,
मद्धम मद्धम सी छुकछुक में,
नागिन मचले हलके हलके । 

बस ये तो अब शुरुवात ही थी,
बातों के मस्त पटोरों में,
देखा सब कैसे मिलजुल कर,
खाते और बातें करते हैं । 

कुछ मोबाइल कभी बजे,
जेबो पर हाँथ क्यों जाता है,
कुछ परिजन जो छूट गए,
उनकी याद दिलाता हैं। 

ऑंखें नम हो सकती ही नहीं,
ये रीत है बाद दुनियादारी,
मैं उन पलों की बातें करता हूँ,
जब हम सब संग थे दिन राती । 

तभी कहीं फ्हवारों सी,
बाजू में हंसी सी फूट पड़ी,
मानों यादों की दुनिया मैं,
एक ठंडी लहर सी दौड़ पड़ी। 

अंदर मौन मैं बैठा हूँ,
देखूं और राहगीरों को,
पूड़ी अचार की बेला में,
कुछ जीरे आलू में महका हूँ। 

अब रात मध्य की ओर बढ़ी,
लोगों ने कम्भल तान लिए,
कुछ फुसफुसाहटों ने कहीं,
दिल के गुबार निकल लिए । 

अब ठंडी साँसे लेते हैं,
मन की सोच के घरोंदों से,
जीवन भी है ये राह बड़ी,
चलना है मस्त परिंदों से । 

आज यहाँ कल हैं कहाँ,
रिश्तों को राख जो उड़ती हैं,
यादों की तस्वीरों में कहीं,
ये काली रात गुज़रती है । 

फिर कहीं स्वेत एक बिंदिया सा,
एक चाँद हमें मिल जाता है,
और मुट्ठी भर सितारों संग,
ख़ुशी का गुबार छाता है। 



 

Wednesday, September 3, 2014

दिन फिर निकल गया 
शाम फिर से आ गई 
आशाओं के दीपक जलाने के समय 
तन्हाई फिर से आ गई 

आँखों के सपने भारी हो रही हैं 
हर बीतते लम्हे के साथ 
ढूंढता रास्ता कहाँ खो गया 
शाम के आने के साथ

क्या ढूंढता हूँ मैं 
क्यों ढूँढता हूँ मैं 
ये कौन सी आशाएँ हैं 
जिन से उजाला बुनता हूँ मैं

Tuesday, June 24, 2014

शिवस्तुति

शिवस्तुति 


सूर्य तेजो चँन्द्र शेखर,
चारु कुण्डल सोमेश्वरा । 
निर्विकार समाधि देवो ,
गौरीनाथ योगेश्वरा । 

कालातीत गुणी गुणेश्वर,
सर्वव्यापी परमेश्वरा । 
ध्यानदीप ध्युतीधारा,
देवादि देव महेश्वरा । 

दीप वेद
June, 24 2014 
vdeep27@gmail.com



शब्दावली :
 चारु: beautiful, graceful and pure
 कालातीत: beyond time
 ध्युतीधारा = ध्युती (splendor) +  धारा (stream) = Lord Of Brilliance



Sunday, June 8, 2014

निशब्द

निशब्द 

क्या बोलूँ क्या जानू  मैं ,
मन को क्या पहचानू मैं । 
शब्दों के आलिंगन मे ,
विचारों को क्यों बांधू मैं । 

माधव ने क्या बोली गीता ,
साधक ने क्या तोली गीता । 
कुरुक्षेत्र की भूमि पर ,
किस किस की हमजोली गीता । 

मौन के अधरों की जिज्ञासा ,
शब्दों मे क्यों बाँधूँ मैं । 
क्या बोलूँ क्या जानू  मैं ,
मन को क्या पहचानू मैं । 




शब्दावली:
आलिंगन - Hug
अधरों- lips
जिज्ञासा - curiosity
 




Saturday, May 31, 2014

मुक्ति

मुक्ति 

मुक्ति के तट पर सँजोया 
स्वप्न घृत दीपक,
माया आलिङ्गित बयार 
रक्त सिंचित नर्क मदमय ।

मनु सन्तति विकार मनमें 
काया मद और लोभ तन्मे,
भक्ति पोषित दम्भनीड़ मे 
प्राण दीपक किस्लय । 



शब्दावली  :
 घृत - घी
सन्तति - पुत्र/वंश (decedents)
नीड़ - Nest
किस्लय - Bud

Sunday, April 6, 2014

ख्वाइशें

क्यों वक्त का बहाना बनाते हो
जब यहाँ सब आपने ही तो हैं
कुछ ख्वाइशें यूं ही पूरी हो जाएंगी
बस मुट्ठी से कुछ पल खोल दे
दिन का वाज़िब इस्तेमाल तो सब कर ही लेंगे
पर तम्मनाओं की ख्वाइशें कहीं अधूरी न रह जाएँ

Wednesday, March 26, 2014

बढे चलो


वीर तुम बढे चलो ,
धीर तुम बढ़े चलो ।
निशब्द क्रांति ठौर है,
जन्म मृत्यु गौड़ है ।

पथ पे शूल हों बड़े
डरें नहीं हटे नहीं
भय भाव मौन हैं
झुके नहीं हिलें नहीं ।



तू सोचता क्यों हश्र का
ज्ञान नहीं केवल चक्ष् का
जो मन से उठे नेत्र हैं
दर्शाते कुरुक्षेत्र हैं

तू बीज है श्रेस्ठ का
न क्लेश का न द्वेष का
वो चारु मन का तेज है
तू आप ही शर्वश्रेष्ठ है

निशब्द क्रांति ठौर है,
जन्म मृत्यु गौड़ है ।










Thursday, January 16, 2014

परिचय


तुम मुझ में हो मैं तुम में हूँ
फिर तुम से मेरा परिचय क्या ।

पत्तों कि पगडंडि तुम तो सलिल कणो की ओस हूँ मैं ,
व्योम अगर तो दिशांत हूँ मैं
सूर्य अगर तो निशांत हूँ मैं ,
तुझ को हो क्यों गर्व विभा का
जब अरुणिमा की तान हूँ मैं ।

तुम मुझ में हो मैं तुम में हूँ
फिर तुम से मेरा परिचय क्या ।

दर्पण में प्रतिबिम्ब , प्राणो में स्मृति
आँखों में मौन के शब्दों कि गति
सिमटे हुए अधरों पर सिसकती सि हंसी
और करूँ जग में मैं सञ्चय क्या

तुम मुझ में हो मैं तुम में हूँ
फिर तुम से मेरा परिचय क्या