छुक छुक गाड़ी
ये पंक्तियाँ आज से करीब ५ साल पहले लिखी गयी जब मैं अपने घर से वापस अमेरिका आ रहा था। पंजाब मेल थर्ड ए सी साइड लोअर बिर्थ, पूर्णिमा की रात, भीड़ का मेला या मेले की भीड़ समझना मुश्किल था । नानाप्रकार की संवेदनाओं से भरा ये सफर कुछ यूँ बयां हो रहा था:
गतिमान हृदय और जटिल बुद्धि समय के बंधनों का विश्लेषण करते हुआ सोच रही थी कि
इस पल दो पल की कहानी मे,
जब आस जगी हल्की हल्की,
फिर बात वही सूनी सूनी,
बस रात बढ़ी चलते चलते ।
पल पल की, ये मैं बात कहूँ ,
ठंडी ठंडी सी रात वही,
कुछ तारे मुट्ठी में सिकोड़ें,
स्वेत बिंदु को चाँद कहूँ ।
भीनी भीनी सी निशा मग्न,
ये रेल चले हलके हलके,
मद्धम मद्धम सी छुकछुक में,
नागिन मचले हलके हलके ।
बस ये तो अब शुरुवात ही थी,
बातों के मस्त पटोरों में,
देखा सब कैसे मिलजुल कर,
खाते और बातें करते हैं ।
कुछ मोबाइल कभी बजे,
जेबो पर हाँथ क्यों जाता है,
कुछ परिजन जो छूट गए,
उनकी याद दिलाता हैं।
ऑंखें नम हो सकती ही नहीं,
ये रीत है बाद दुनियादारी,
मैं उन पलों की बातें करता हूँ,
जब हम सब संग थे दिन राती ।
तभी कहीं फ्हवारों सी,
बाजू में हंसी सी फूट पड़ी,
मानों यादों की दुनिया मैं,
एक ठंडी लहर सी दौड़ पड़ी।
अंदर मौन मैं बैठा हूँ,
देखूं और राहगीरों को,
पूड़ी अचार की बेला में,
कुछ जीरे आलू में महका हूँ।
अब रात मध्य की ओर बढ़ी,
लोगों ने कम्भल तान लिए,
कुछ फुसफुसाहटों ने कहीं,
दिल के गुबार निकल लिए ।
अब ठंडी साँसे लेते हैं,
मन की सोच के घरोंदों से,
जीवन भी है ये राह बड़ी,
चलना है मस्त परिंदों से ।
आज यहाँ कल हैं कहाँ,
रिश्तों को राख जो उड़ती हैं,
यादों की तस्वीरों में कहीं,
ये काली रात गुज़रती है ।
फिर कहीं स्वेत एक बिंदिया सा,
एक चाँद हमें मिल जाता है,
और मुट्ठी भर सितारों संग,
ख़ुशी का गुबार छाता है।