वीर तुम बढे चलो ,
धीर तुम बढ़े चलो ।
निशब्द क्रांति ठौर है,
जन्म मृत्यु गौड़ है ।
पथ पे शूल हों बड़े
डरें नहीं हटे नहीं
भय भाव मौन हैं
झुके नहीं हिलें नहीं ।
तू सोचता क्यों हश्र का
ज्ञान नहीं केवल चक्ष् का
जो मन से उठे नेत्र हैं
दर्शाते कुरुक्षेत्र हैं
तू बीज है श्रेस्ठ का
न क्लेश का न द्वेष का
वो चारु मन का तेज है
तू आप ही शर्वश्रेष्ठ है
निशब्द क्रांति ठौर है,
जन्म मृत्यु गौड़ है ।
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