Monday, April 11, 2016

प्यारी नैयना



गोला छोटा सा गोला
हवा से हल्का, बादल का टुकड़ा
छोटा सा गोला रुईका गोला 

मुस्कुराते नैयना तेरे 
गोल गोल कान 
प्यारी छोटी बिल्ली मेरी
तू हम सबकी जान 

तू हम सबकी जान कहूँ क्यों 
नन्हें पग जब रखती
टूकुर टूकुर हम सब तुम्हें देखें
धप्प से जब तू गिरती

धप्प से जब तू गिरती फिर
हम सबका जी घबराए
फिर मुस्कान से पलक झपकती
हम सब फिर इठलाएँ

गोद उठाकर पुच्ची पुच्ची
प्यार से तुम्हें झुलाएँ
मामा मामी जन्मदिवस पे
सारी ख़ुशियाँ लुटाएँ

दीप वेद 





Sunday, April 10, 2016

खो गया

भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया

सुगबग़ाहट मन ही मन में हो रही
आँखें मूँदें तम निशा में खो गया
चाँद से कहना तू मद में चूर है
मैं निशा की ओस ही में बह गया

साथ मेरे भीड़ यूँ ही मौन है
मैं तो पंछी कब का देखो उड़ गया
है ख़यालों में वही बस नाम यूँ 
आँख मूँदीं तो सवेरा हो गया

भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया

दीप वेद

Friday, March 25, 2016

रंग आज का

परछायियों के रंग नहीं 
और रंगों में कहाँ हैं परछायियाँ
फिर क्यों ढूँढ़े रंगों को परछायियों में

जो आज है वो रंग है
जो बीत गया सो कल
जब आने वाला ज्ञात नहीं
तो जी लो यह एक पल

दीप

Tuesday, February 17, 2015

सम्पूर्ण शिवस्तुति

सूर्य तेजो चँन्द्र शेखर,
चारु कुण्डल सोमेश्वरा । 
निर्विकार समाधि देवो ,
गौरीनाथ योगेश्वरा । 

कालातीत गुणी गुणेश्वर,
सर्वव्यापी परमेश्वरा । 
ध्यानदीप ध्युतीधारा,
देवादि देव महेश्वरा । 

नमस्ते नमस्ते गिराज्ञानगंगा,
चिदानंद मूर्ति भुजंगकाल सांगा ।
नमस्ते नमस्ते प्रभु आदिनाथम्,
तुरीयं विशालम् परब्रह्मनाथम् ।
कृपालु भयान्तर विभुं भूतनाथं,
ताण्डवम रूद्र रूपा सृजन सम प्रकाशम् ।
नमस्ते गुरु रूप नादी अनादि,
शिवम सम शरीरो दीपम नमामि । 

दीप वेद 

Friday, November 28, 2014

शीत संध्या

शीत संध्या

ये लावा सी शाम,
घाना आसमान,
खिड़की की ओट से,
सुलघ सुलघ जाए ।

निशा का आवन,
ठिठुरते प्राण,
भागती किरणों को,
पकड़ के लाये । 

ये डूबता अभिमान,
शीतलहर शाम,
कनक बादलों पर,
रंग बिखेरे जाए । 

कुछ बैगनी से धब्बे,
कुछ गुलाबी जुरमुठें ,
नारंगी फ़िज़ा में ,
घुले घुले जाए ।
 

Friday, September 26, 2014

छुक छुक गाड़ी

छुक छुक गाड़ी 

ये पंक्तियाँ आज से करीब ५ साल पहले लिखी गयी जब मैं अपने घर से वापस अमेरिका आ रहा था। पंजाब मेल थर्ड ए सी साइड लोअर बिर्थ, पूर्णिमा की रात, भीड़ का मेला या मेले की भीड़ समझना मुश्किल था । नानाप्रकार  की संवेदनाओं से भरा ये सफर कुछ यूँ  बयां हो रहा था:

गतिमान हृदय और जटिल बुद्धि समय के बंधनों का विश्लेषण करते हुआ सोच रही थी कि

इस पल दो पल की कहानी मे,
जब आस जगी हल्की हल्की,
फिर बात वही सूनी सूनी,
बस रात बढ़ी चलते चलते । 

पल पल की, ये मैं बात कहूँ ,
ठंडी ठंडी सी रात वही,
कुछ तारे मुट्ठी में  सिकोड़ें,
स्वेत बिंदु को चाँद कहूँ । 

भीनी भीनी सी निशा मग्न,
ये रेल चले हलके हलके,
मद्धम मद्धम सी छुकछुक में,
नागिन मचले हलके हलके । 

बस ये तो अब शुरुवात ही थी,
बातों के मस्त पटोरों में,
देखा सब कैसे मिलजुल कर,
खाते और बातें करते हैं । 

कुछ मोबाइल कभी बजे,
जेबो पर हाँथ क्यों जाता है,
कुछ परिजन जो छूट गए,
उनकी याद दिलाता हैं। 

ऑंखें नम हो सकती ही नहीं,
ये रीत है बाद दुनियादारी,
मैं उन पलों की बातें करता हूँ,
जब हम सब संग थे दिन राती । 

तभी कहीं फ्हवारों सी,
बाजू में हंसी सी फूट पड़ी,
मानों यादों की दुनिया मैं,
एक ठंडी लहर सी दौड़ पड़ी। 

अंदर मौन मैं बैठा हूँ,
देखूं और राहगीरों को,
पूड़ी अचार की बेला में,
कुछ जीरे आलू में महका हूँ। 

अब रात मध्य की ओर बढ़ी,
लोगों ने कम्भल तान लिए,
कुछ फुसफुसाहटों ने कहीं,
दिल के गुबार निकल लिए । 

अब ठंडी साँसे लेते हैं,
मन की सोच के घरोंदों से,
जीवन भी है ये राह बड़ी,
चलना है मस्त परिंदों से । 

आज यहाँ कल हैं कहाँ,
रिश्तों को राख जो उड़ती हैं,
यादों की तस्वीरों में कहीं,
ये काली रात गुज़रती है । 

फिर कहीं स्वेत एक बिंदिया सा,
एक चाँद हमें मिल जाता है,
और मुट्ठी भर सितारों संग,
ख़ुशी का गुबार छाता है। 



 

Wednesday, September 3, 2014

दिन फिर निकल गया 
शाम फिर से आ गई 
आशाओं के दीपक जलाने के समय 
तन्हाई फिर से आ गई 

आँखों के सपने भारी हो रही हैं 
हर बीतते लम्हे के साथ 
ढूंढता रास्ता कहाँ खो गया 
शाम के आने के साथ

क्या ढूंढता हूँ मैं 
क्यों ढूँढता हूँ मैं 
ये कौन सी आशाएँ हैं 
जिन से उजाला बुनता हूँ मैं