जब जीवन मैं आया नव प्रभात,
उड़ता रहा मैं पंख पसारे,
ऊपर नीचे गगन तरु पर,
हँसता गाता रात दिन सारे
जीवन की इस बेला को,
बहुत दिनों से चाह था,
मद मस्त हुआ मैं जानू क्या,
सब को यूँ ही मैं भुलाया चला,
पर फ़िर जीवन ने मोड़ लिया,
दीपों की लौ घट जाने लगी,
पग पर घावों की तडपन ने,
अश्रु भावों के आने लागे,
अब याद आए है रात बड़ी,
जब जग को भुलाये सोते थे ,
मखमल के गद्दे, कोमल तकियों पर,
सपनो के महल संजोते थे,
गर्दन की अकड़
सीना भी कड़क
संकोच की शिकन नही होती थी,
साहस नही दुसाहस भी
आखों से बयां यूं होती थी
फिर समय ने एक करवट बदली,
टूटा स्वप्नों का विशाल महल,
फिर कस्ट भरी आंधी ने कभी,
हीला दिए कुछ अकड़ वृक्ष
पानी की बहारे कब मुख पर,
आँसू बन कर बस फूट पड़ी,
कन्धों के बोझों को सह कर,
जाने कब गर्दन झूल पड़ी
अब ये आंधी बस हवा ही है,
जो चले नही तो साँस रुके,
अब से कांटे पग फूल हैं बस,
न हो तो रास्ते धुंध दिखें
संघर्ष की तपती अग्नि ने
मुझको इतना तपा दिया
की क्या पाया क्या ख़ोया यहाँ
इस बात को बस यूँ भुला चला
अब फरक नही पड़ता है मुझे
नफरत इर्षा होती ही नही
बस शान्ति मन मैं व्याप्त है यूँ
जग की चिंता होती ही नही
दीप
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Tuesday, December 8, 2009
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