क्या शोर है चारों तरफ़ ,
आवाज़ों ने क्यों हिला दिया ।
आँखों को जब भी बंद किया,
बस ख़्वाब ने ही थका दिया ।
मुट्ठी में सिसकी रेत कभी,
उँगलियों की शह पर खिसक गयीं ।
होठों पे ख़ुशी बनावट की
आँखों के कोनो में झलक पड़ी ।
ये शोर कहीं बाहर तो नहीं,
अंदर तो मैं बस सहमा हूँ ।
या शायद हलचल अंदर है
अल्फ़ाज़ों में मैं बहका हूँ ।
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