आज रात एक सपना देखा
सपने में एक अपना देखा
देख कर, भटक गया क्यों
भौचका सा अटक गया क्यों
मां तुम कहां खो गई थी ।
कितना कुछ हो गया साल में
तुम बिन मैं हूं बुरे हाल में
छोटी छोटी बातें अब मैं
किस से बोलूं किस्से बोलूं
देस पराया लगता है ये
अनजाने सब रिश्ते हैं ये
कड़ी मेरी, तुम इस दुनिया की
टूट गई बोलो क्यों चुप हो
मौन तुम्हारा मन को खाए
तुम इतने दिन बाद क्यों आई
एक बार मुस्का दो फिर से
गले लगा लो आज फिर से
मां न बोली एक शब्द तक
सुनती रही मेरी बिरहा को
फिर आंखों में ज्वलित रोशनी
जाग गया बौचक्का हो कर
थका थका सा अब भी हूं मैं
आहट तेरी बांट रहा हूं
फिर से आना कल सपनों में
तेरा रास्ता निहार रहा हूं
फिर से आना सपने में
इस बार शिकायत नहीं करूंगा
मुझे बताना कहां गई हो
पीछे मैं भी आ जाऊंगा झट् से