प्रस्तावना: ये कविता लोककथाओं से प्रेरित नर्मदा की है । कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रही या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन हर कथा का अंत कमोबेश वही, कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उलटी दिशा में चल पड़ीं। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती दिखाई देती है। मत्स्यपुराण में नर्मदा का वर्णन इस प्रकार है जिसे मैंने भी अपनी कविता में हिंदी में रूपांतरित किया है -
नाम मेरा नर्मदा,
इठलाती बलखाती मैं
मेघदूत की रेवा ॥
जैसे सारी नदियाँ झूमें
मैं भी वैसे झूमी ,
निकल पड़ी पूरब की ओर
निष्छल चंचल हिरणी ॥
संगमरमर का यौवन लेकर
शोणभद्र को पाया ,
जुहिला नामक सखी को
ये प्रेम प्रसंग सुनाया ॥
ईर्षा ने जुहिला के मन में
तीर घृणा के बांधे ,
मेरे आभूषण वस्त्र पहनकर
पहुँची सोन के आगे ॥
निष्ठुर पुरुष, दुर्बल नियत
नियति ने पाश बिछाया,
जुहिला सोन एक हुए
अश्रु मन भांप न पाया
क्रोधग्नि से कम्पित मैं
विपरीत दिशा में भागी,
अश्रु सिंचित मार्ग की सारी
चट्टानों पर भारी ॥
सोन पछताया ,और चीखा लौट आ
वियोगमय ये जीवन ,है श्राप सा ,
आप से रंजीत हूँ ,नतमस्तक खड़ा
क्यों न अपनी धाराओं को ,मैं बाँध सका ॥
अश्रु नैनों में ओझल , नर्मदे ।
वेगधारी क्रांतिकारी , नर्मदे ।
शक्ति की पर्याय तू है , नर्मदे ।
स्वछता चरमोशिखर है , नर्मदे ।
गंगा कनखल में पवित्र है
सरस्वती कुरुक्षेत्र
तू कण कण मैं पवित्र है
नमन तीर्थक्षेत्र ॥
रूद्र कन्या हूँ मैं सोन,
अपमान न सह पाऊँगी,
नियति मेरी पश्चिम है
खम्बाट में मिल जाऊँगी ॥
दूर सोन से जाऊँगी
जितनी है रात अरुण से,
प्रेम मधुरता दूर रहे,
हूँ रुष्ट सारे जगत से ॥
रंज से उत्तम न कोई जोश है,
क्रोध की ज्वाला में ही तो रोष है,
हो कठोर जितना भी पर्वत सामने,
चिर सफलता ही तो मेरा दोष है ॥
वेगधारा होगा मेरा हर घाट,
शूलपाणि हो या भेड़ाघाट,
शुकलतीर्थ कपिलधारा,
तांडव है मेरा नाद ॥
शांत तब जब मुक्ति मिले
जीवन है तीव्र बहना,
हर उस कण में शक्ति भरदूं
जहाँ अंधियारी रैना ॥
दीप वेद - जून ६, २०१६
"पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती । ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥ "उद्गम विंद्याचल की गोद में
नाम मेरा नर्मदा,
इठलाती बलखाती मैं
मेघदूत की रेवा ॥
जैसे सारी नदियाँ झूमें
मैं भी वैसे झूमी ,
निकल पड़ी पूरब की ओर
निष्छल चंचल हिरणी ॥
संगमरमर का यौवन लेकर
शोणभद्र को पाया ,
जुहिला नामक सखी को
ये प्रेम प्रसंग सुनाया ॥
ईर्षा ने जुहिला के मन में
तीर घृणा के बांधे ,
मेरे आभूषण वस्त्र पहनकर
पहुँची सोन के आगे ॥
निष्ठुर पुरुष, दुर्बल नियत
नियति ने पाश बिछाया,
जुहिला सोन एक हुए
अश्रु मन भांप न पाया
क्रोधग्नि से कम्पित मैं
विपरीत दिशा में भागी,
अश्रु सिंचित मार्ग की सारी
चट्टानों पर भारी ॥
सोन पछताया ,और चीखा लौट आ
वियोगमय ये जीवन ,है श्राप सा ,
आप से रंजीत हूँ ,नतमस्तक खड़ा
क्यों न अपनी धाराओं को ,मैं बाँध सका ॥
अश्रु नैनों में ओझल , नर्मदे ।
वेगधारी क्रांतिकारी , नर्मदे ।
शक्ति की पर्याय तू है , नर्मदे ।
स्वछता चरमोशिखर है , नर्मदे ।
गंगा कनखल में पवित्र है
सरस्वती कुरुक्षेत्र
तू कण कण मैं पवित्र है
नमन तीर्थक्षेत्र ॥
रूद्र कन्या हूँ मैं सोन,
अपमान न सह पाऊँगी,
नियति मेरी पश्चिम है
खम्बाट में मिल जाऊँगी ॥
दूर सोन से जाऊँगी
जितनी है रात अरुण से,
प्रेम मधुरता दूर रहे,
हूँ रुष्ट सारे जगत से ॥
रंज से उत्तम न कोई जोश है,
क्रोध की ज्वाला में ही तो रोष है,
हो कठोर जितना भी पर्वत सामने,
चिर सफलता ही तो मेरा दोष है ॥
वेगधारा होगा मेरा हर घाट,
शूलपाणि हो या भेड़ाघाट,
शुकलतीर्थ कपिलधारा,
तांडव है मेरा नाद ॥
शांत तब जब मुक्ति मिले
जीवन है तीव्र बहना,
हर उस कण में शक्ति भरदूं
जहाँ अंधियारी रैना ॥
दीप वेद - जून ६, २०१६