शीत संध्या
ये लावा सी शाम,
घाना आसमान,
खिड़की की ओट से,
सुलघ सुलघ जाए ।
निशा का आवन,
ठिठुरते प्राण,
भागती किरणों को,
पकड़ के लाये ।
ये डूबता अभिमान,
शीतलहर शाम,
कनक बादलों पर,
रंग बिखेरे जाए ।
कुछ बैगनी से धब्बे,
कुछ गुलाबी जुरमुठें ,
नारंगी फ़िज़ा में ,
घुले घुले जाए ।