तुम मुझ में हो मैं तुम में हूँ
फिर तुम से मेरा परिचय क्या ।
पत्तों कि पगडंडि तुम तो सलिल कणो की ओस हूँ मैं ,
व्योम अगर तो दिशांत हूँ मैं
सूर्य अगर तो निशांत हूँ मैं ,
तुझ को हो क्यों गर्व विभा का
जब अरुणिमा की तान हूँ मैं ।
तुम मुझ में हो मैं तुम में हूँ
फिर तुम से मेरा परिचय क्या ।
दर्पण में प्रतिबिम्ब , प्राणो में स्मृति
आँखों में मौन के शब्दों कि गति
सिमटे हुए अधरों पर सिसकती सि हंसी
और करूँ जग में मैं सञ्चय क्या
तुम मुझ में हो मैं तुम में हूँ
फिर तुम से मेरा परिचय क्या