पथ के कांटे क्यों कांटे हैं
हैं फूल कहाँ कांटों से रहित ,
जब ठान लिया मन मैं है द्रड
तो रोडे ही पथ सर्जन हैं ।
रात उमड़ती काली हो
तम का दवाब कम होता है,
जब अरुणिमा चिर वेग से फिर
गगन प्रकाशमय होता है ।
तू थककर के रुक जाना नहीं
जब रात गुज़रने वाली है,
पल भर बस चलता जा राही
मंज़िल तो आने वाली है ।
हैं फूल कहाँ कांटों से रहित ,
जब ठान लिया मन मैं है द्रड
तो रोडे ही पथ सर्जन हैं ।
रात उमड़ती काली हो
तम का दवाब कम होता है,
जब अरुणिमा चिर वेग से फिर
गगन प्रकाशमय होता है ।
तू थककर के रुक जाना नहीं
जब रात गुज़रने वाली है,
पल भर बस चलता जा राही
मंज़िल तो आने वाली है ।