Thursday, May 26, 2016

पग चिन्ह

कुछ पग चिन्ह
रेत की स्याही से लिखे 
लम्बी गहरी यादों के
ये पल चिन्ह

आगे बड़ते बढ़ते 
चमकीली रेत पे 
कुछ गहरे कुछ उथले
ये पग चिन्ह

लहर अभी तक दूर थी 
दिन बस ढलने लगा 
संध्या तम से तीव्रता थी
अनभिज्ञ मन के झरोखों में

एक एक ज्वार भारी पड़ा
उथले गहरे प्रतिबिम्बों पे
सब चिन्हों का नाश हुआ
सब आलिंगन झूठे थे 

पैरों की गलियों में कहीं 
रेणु के कुछ पल अटक गए 
ना जाने क्यों इनको संजोये रखें हैं 
कुछ पल चिन्हों के पग चिन्ह


Friday, May 13, 2016

दो राहें

ना जाने क्यों दो राहें 
आपस में मिल जाती है 
फिर संग चलते चलते 
दो राहें क्यों हो जाती हैं 

कितने मुसाफ़िर कितनी मंज़िलें 
इन राहों ने साथ ही देखीं हैं 
अमिट फ़सानो की बेफ़िक्रियाँ 
इन राहों ने ही झेली हैं

थके हुए आसमान भी जब 
दूर तलक झुक जाते 
जाने कैसे नभ के तारे 
इन राहों से टकराते है 

रात भी देखी साथ में तेरे 
दिन का उजाला ओढ़ा है 
बरखा की चंद बूँदों से 
गीला रास्ता महका है

फिर आता है मोड़ कभी
ये मोड़ बड़े आड़े टेड़े
फिर कुछ तो हो जाता है 
सब राहें ख़ुद खो जातीं हैं 

फिर ऐसा क्या हो जाता है 
मंज़िले क्यों बँट जाती है 
क्यों संग चलते चलते यूँही
दो रहे क्यों हो जाती हैं 








Monday, April 11, 2016

प्यारी नैयना



गोला छोटा सा गोला
हवा से हल्का, बादल का टुकड़ा
छोटा सा गोला रुईका गोला 

मुस्कुराते नैयना तेरे 
गोल गोल कान 
प्यारी छोटी बिल्ली मेरी
तू हम सबकी जान 

तू हम सबकी जान कहूँ क्यों 
नन्हें पग जब रखती
टूकुर टूकुर हम सब तुम्हें देखें
धप्प से जब तू गिरती

धप्प से जब तू गिरती फिर
हम सबका जी घबराए
फिर मुस्कान से पलक झपकती
हम सब फिर इठलाएँ

गोद उठाकर पुच्ची पुच्ची
प्यार से तुम्हें झुलाएँ
मामा मामी जन्मदिवस पे
सारी ख़ुशियाँ लुटाएँ

दीप वेद 





Sunday, April 10, 2016

खो गया

भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया

सुगबग़ाहट मन ही मन में हो रही
आँखें मूँदें तम निशा में खो गया
चाँद से कहना तू मद में चूर है
मैं निशा की ओस ही में बह गया

साथ मेरे भीड़ यूँ ही मौन है
मैं तो पंछी कब का देखो उड़ गया
है ख़यालों में वही बस नाम यूँ 
आँख मूँदीं तो सवेरा हो गया

भीड़ का पंछी अकेला
किस जहाँ में खो गया
रात का ढलता ये कौहरा
आसमं में सो गया

दीप वेद

Friday, March 25, 2016

रंग आज का

परछायियों के रंग नहीं 
और रंगों में कहाँ हैं परछायियाँ
फिर क्यों ढूँढ़े रंगों को परछायियों में

जो आज है वो रंग है
जो बीत गया सो कल
जब आने वाला ज्ञात नहीं
तो जी लो यह एक पल

दीप

Tuesday, February 17, 2015

सम्पूर्ण शिवस्तुति

सूर्य तेजो चँन्द्र शेखर,
चारु कुण्डल सोमेश्वरा । 
निर्विकार समाधि देवो ,
गौरीनाथ योगेश्वरा । 

कालातीत गुणी गुणेश्वर,
सर्वव्यापी परमेश्वरा । 
ध्यानदीप ध्युतीधारा,
देवादि देव महेश्वरा । 

नमस्ते नमस्ते गिराज्ञानगंगा,
चिदानंद मूर्ति भुजंगकाल सांगा ।
नमस्ते नमस्ते प्रभु आदिनाथम्,
तुरीयं विशालम् परब्रह्मनाथम् ।
कृपालु भयान्तर विभुं भूतनाथं,
ताण्डवम रूद्र रूपा सृजन सम प्रकाशम् ।
नमस्ते गुरु रूप नादी अनादि,
शिवम सम शरीरो दीपम नमामि । 

दीप वेद 

Friday, November 28, 2014

शीत संध्या

शीत संध्या

ये लावा सी शाम,
घाना आसमान,
खिड़की की ओट से,
सुलघ सुलघ जाए ।

निशा का आवन,
ठिठुरते प्राण,
भागती किरणों को,
पकड़ के लाये । 

ये डूबता अभिमान,
शीतलहर शाम,
कनक बादलों पर,
रंग बिखेरे जाए । 

कुछ बैगनी से धब्बे,
कुछ गुलाबी जुरमुठें ,
नारंगी फ़िज़ा में ,
घुले घुले जाए ।